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Sunday, September 11, 2016

21वीं सदी का भारत....

21वीं सदी का भारत... वास्तविकता या मिथक



जहाँ अर्थव्यवस्था और प्रौद्योगिक उन्नति की दुदुम्बी बज रही है वहाँ रूड़ी-वादी सोच और ओच्छि मानसिकता इसे अन्दर से खोखला कर रही है |
एक तरफ़ हम डिजिटल भारत के जागते हुए स्वप्न देख रहे हैं वहीं दूसरी तरफ़ क्षुब्ध और तुच्छ सोच जैसे लड़का-जन्मोत्सव, लड़की-भ्रूणहत्या, लड़की-जन्महत्या, शादियों में कन्या को पारंपरिक तौर से वस्तु घोषित करना (लड़की-वालों के द्वारा किया हुआ "कन्यादान"), महिलाओं को लाज के नाम पर घूँघट में रखना आदि देश के वास्तविक विकास को दर्शा रहे हैं |

एक महिला जिसने पूरी ज़िन्दगी रूड़ीवादी जंजीरों में जकड़ी हुई काटी हो, अपने पुत्र और पति के द्वारा प्रताड़ित रही हो, वो अपनी सारी खीज अपनी गृह-वधु (बहु) पर निकालती है | जब क़दम उठाना चाहिए था, तब उठाया नहीं, हिम्मत ही नहीं थी, अब घर आई लक्ष्मी पर क्रोध किस लिए ?
आज देश में स्त्री 944 हर 1000 पुरुष पर रह गई हैं और यह वो देश है जहाँ पर हम स्त्री के मान-सम्मान के ख्याल की बात करते हैं |
महिला-तस्करी में अधिकाँश हाथ महिलाओं का ही होता है, शर्म की बात है कि वे स्वयं एक स्त्री होकर दूसरी स्त्री को नश्वर-धन कमाने की मशीन समझती हैं | यह देखकर कुत्ते और बिल्ली की तरह मानसिकता वाले पुरुष इस बात का लाभ उठाते हैं | उनपर हवस इतना चढ़ चुका होता है कि वे एक पशु के समान हरकतें करने लगते हैं |

बेटों से मेरी हाथ-जोड़कर विनती है कि घर में अपनी माता का हाथ बटाएं,
और जो यह सोच है ना
"झाड़ू पोछा बर्तन धोना ये केवल लड़कियों का काम है",
इसे जितनी जल्दी हो सके अपने मन से निकाल दो और अगर सच में स्वयं को पुरुष कहने का अभिमान है तो सही में पुरुष बनो |



जो अपनी माता का ध्यान रखते वे नपुंसक है और उनकी माता से उन्हें जन्म देकर सबसे बड़ी मूर्खता की है |

वे धरती माँ के सबसे बड़े बोझ हैं जो लड़कियों को बोझ समझते हैं |

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